गुरुवार, 30 जनवरी 2014

भजता क्यू ना रे हरिनाम,Bhajta kyu naa re harinaam

Bhajta kyu naa re harinaam

bhajta kyu naa re harinaam, teri kodi lage na chidam ॥ ter॥
daant diya hai mukhade ki shobha, jeebh daiee rat naam॥ 1 ॥
nainaa diya hai darshan karba, kaan diya sun gyaan॥ 2॥
paav diya hai teerath karba, haath diya kar daan॥ 3॥
sharir diyo upkar karaNne, hari charNo mai dhyan॥ 4॥
banda ! teri kodi lage na chidam, rtata kyu naa re harinaam ॥ 5 ॥

In Hindi :-
भजता क्यू ना रे हरिनाम, तेरी कौडी लगे न छिदाम ॥ टेर॥
दांत दिया है मुखड़े की शोभा, जीभ दई रट नाम॥ १ ॥
नैणा दिया है दरशण करबा, कान दिया सुन ज्ञान॥ २॥
पाँव दिया है तीरथ करबा, हाथ दिया कर दान॥ ३॥
शरीर दियो उपकार करणने, हरि चरणों मे ध्यान॥ ४॥
बन्दा ! तेरी कौडी लगे न छिदाम, रटता क्यू ना रे हरिनाम ॥ ५ ॥

नाथ मै थारोजी थारो ! Naath mai tharoji tharo !

Naath mai tharoji tharo !
chokho, buro, kutil, aru kami jo kuch hun so tharo॥ 1 ॥
bigadyo hun to tharo bigaDyo, the himane sudharo।
sudharyotharoto prabhu sudharyo tharo hun aakhr tabar tharo।
buro kuhakar mai rah jasyu, nanv bigaDsi॥ 3 ॥
tharo hun, tharo hi bajun, rehsyu tharo tharo !! ।
aangaliyan nuhn pre n hove, ya to aap bicharo॥ 4 ॥
meri baat jaay to jaao, soch nahi kuch mharo।
mere bdo soch yo lagyo, bird laajsi tharo॥ 5 ॥
jche jistra karo nath ! ab, maro, chahetyaro।
jaan ughadiya laaj mrega, udi baath bicharo॥ 6 ॥

In Hindi:-
नाथ मै थारोजी थारो !
चोखो, बुरो, कुटिल, अरु कामी जो कुछ हूँ सो थारो॥ १ ॥
बिगड्यो हूँ तो थारो बिगड्यो, थे ही मने सुधारो।
सुधरयो तो प्रभु सुधरयो थारो, था सू कदे न न्यारो॥ २ ॥
बुरो, बुरो, मै भोत बुरो 
हूँ, आखर टाबर थारो।
बुरो कुहाकर मै रह जस्यू, नांव बिगड्सी॥ ३ ॥
थारो हूँ, थारो ही बाजूं, रह्स्यु थारो थारो !! ।
आंगालियाँ नुहँ परै न होवै, या तो आप बिचारो॥ ४ ॥
मेरी बात जाय तो जाओ, सोच नहीं कुछ म्हारो।
मेरे बडो सोच यो लाग्यो, बिरद लाजसी थारो॥ ५ ॥
जचै जिसतराँ करो नाथ ! अब, मारो, चाहे त्यारो।
जाँघ उघाड्याँ लाज मरेगा, ऊँडी बात बिचारो॥ ६ ॥


बुधवार, 29 जनवरी 2014

कौन कहते हैं भगवान आते नहीं

कौन कहते हैं भगवान आते नहीं
भक्त मीरा के जैसे बुलाते नहीं।

कौन कहते हैं भगवान सोते नहीं
मां यशोदा के जैसे सुलाते नहीं।

कौन कहते हैं भगवान खाते नहीं।
बेर भक्त शबरी के जैसे खिलाते नही

कौन कहते हैं भगवान प्यार जानते नहीं
गोपियों की तरह तुम नचाते नहीं

कौन कहते हैं भगवान सुनते नहीं।
सखा अर्जुन की तरह तुम सुनाते नहीं।

कौन कहते है भगवान दुःख हरते नहीं
बहन द्रोपदी के जैसे बुलाते नहीं।....

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

To all my sisters.....

To all my sisters.....
मेरी प्यारी बहनों मेरी नजरे में सिर्फ आपके लिए बहन का भाव है. आप कितने भी छोटे कपडे पहनो या बड़े. मेरी नजरे सिर्फ और सिर्फ तुम्हे १ बहन की तरह स्नेह के भाव से देखेगी. अगर मैंने तुम्हे छोटे कपडे पहनने पर टोका तो तुम्हे लगा की मेरी सोच छोटी है, तुम्हे लगा की मुझे मेरी नजरो को बदलना चाहिए, बहन मेरी नजर बुरी नहीं है और मेरी सोच भी छोटी नहीं है. मुझे समझो.
तुम्हारे छोटे कपडे मेरे जैसे भाई का ईमान नहीं बदल सकते लेकिन उन भेडियो का क्या करोगी जो कुत्ते की तरह तांकते रहते है. चोरो से बचने के लिए ताला लगाना पड़ता है. इंसान अपनी नजरे और नजरिये बदल सकता है, लेकिन हैवान की नजरो से तुम्हे बचने के लिए ये बड़ा भाई तुम्हे नसीहत देता है. सर्दी ज्यादा होती है तो तुम जुकाम के डर से ज्यादा कपडे पहन सकती हो, जबकि जुकाम ३ दिन में ठीक हो सकता है, लेकिन अगर तुम्हारे कम कपडे पहनने से अगर तुम्हे कोई छेड़ता है, या उससे भी आगे बढ़ता है तो वो नुक्सान जिन्दगी भर उठाना पड़ेगा. इसीलिए तुम्हे ये नसीहत देता हु.
ये मत सोचो की हम लोग तुम्हारे ऊपर पाबन्दी लगाना चाहते है, हम खुद चाहते है की तुम जैसी चाहो वैसी रहो, लेकिन समय बदलने में टाइम लगेगा. हम लोग पहले से जायदा सजग है, जयादा सतर्क है. राजनितिक और सामाजिक स्तर पर आपकी रक्षा के लिए , राखी का फर्ज आदा करने के लिए हर संभव कोशिस कर रहे है, हर स्तर पर अपना संघर्ष जारी रखे है, और १ दिन वो माहौल देंगे तुमको की तुम उसमे खुश रह सको. दुवा करना की आपके सुरक्षा के लिए आपके भाइयो की मेहनत रंग लाये. क्यों की इस नामर्द सरकार से तो कोई आशा बची नही है.
_____हर बहन का भाई 

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

छोटी उम्रसे ही साधना करना क्यों आवश्यक है ???

छोटी उम्रसे ही साधना करना क्यों आवश्यक है ???

अधिकतर युवा साधकोंको साधना करते देख कुछ अल्पज्ञानी उन्हें दिशाभ्रमित करते है कि अभी आपकी उम्र ही क्या हुई है, अभीसे यह सब करने की क्या अवश्यकता है ? साधना तो बुढ़ापेमें सर्व उत्तरदायित्वसे मुक्त होकर करना चाहिए; परंतु यह अपने आपमें यह एक त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण है | छोटी उम्रसे ही साधना करना क्यों आवश्यक है आइए यह देखें !
१. प्राचीन कालमें राजकुमारोंका भी गुरुकुलमें धर्मशिक्षण लेना :
आज हमारी भारतीय संस्कृतिकी रीढ़, वर्णाश्रमव्यवस्था, टूट चुकी है और इसका कारण है धर्मशिक्षण और साधनाका अभाव | पूर्व कालमें राजा महाराजा भी अपने राजकुमारोंको गुरुकुलमें भेजते थे और उसका कारण था कि बाल्य कालमें साधना एवं धर्मके संस्कारका बीजारोपण हो जाए | ऐसे राजकुमार ही भविष्यमें अपने राजधर्मका निर्वाह करनेके पश्चात अपनी अगली पीढ़ीको राजधर्मका पाठ पढ़ा, राज सिंहासनका त्याग कर वानप्रस्थकी ओर प्रवास करते थे | धर्मशिक्षण और साधनाके अभावमें आजके राजनेता और गृहस्थ अपने जीवनके अंतिम चरणमें पहुँचनेपर भी अपने पद और आसक्तियोंका त्याग नहीं कर पाते |
२. ब्रहचर्य आश्रम या विद्यार्थी जीवनमें साधनाकी नींव परम आवश्यक :
वस्तुत: साधना जितनी शीघ्र आरंभ कर सकें उतना ही अच्छा होता है | विद्यार्थी जीवनमें मनकी एकाग्रता और आत्मनियंत्रण(ब्रह्मचर्य), यह दोनों साध्य करनेके लिए आत्मबल आवश्यक होता है | यह साधनाद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है | आजके विद्यार्थियोंको साधनाकी नितांत आवश्यकता है, हमारी निधर्मी सरकारने साधनाका महत्व आजके युवा मनपर अंकित नहीं किया, परिणामस्वरूप आज अनेक युवा व्यभिचार करते हैं, व्यसन करते है और छोटी उम्रमें बलात्कार और अन्य जघन्य अपराधोंमें लिप्त होते दिखाई दे रहे हैं, यह सब अधर्म एवं साधनाके अभावका परिणाम है |
३. गृहस्थ जीवनमें होने वाले ८०% समस्याओंका मूल कारण आध्यात्मिक होता है !
आज विश्वकी १०० % जनसंख्या धर्माचरणके अभावमें पितृदोष और अनिष्ट शक्तिके कष्टसे पीड़ित है | अनेक गृहस्थके जीवनमें धन एवं सारे वैज्ञानिक सुख-साधन होते हुए भी उनका जीवन नर्क समान है | पाश्चात्य संस्कृतिके अंधानुकरण और वैदिक संस्कृति अनुसार धर्माचरण नहीं करनेके कारण अधिकांश व्यक्ति दुखी और कष्टमें हैं | इसका मूल कारण है कि ब्राह्मचर्य कालमें धर्माचरणका बीजारोपण नहीं हो पाना | हिंदुओं को न घरमें, न मंदिर और न ही विद्यालय या महाविद्यालयमें साधना बताई जाती है परिणामस्वरूप जब ऐसे विद्यार्थी गृहस्थ जीवनमें प्रवेश करते हैं तो उन्हें अनेक आध्यात्मिक स्तरके कष्ट सहने पड़ते हैं क्योंकि शास्त्र वचन है ‘सुखस्य मूल: धर्म:’ अर्थात सुखका मूल कारण धर्म है, सुखी जीवन हेतु धर्माचरण परम आवश्यक है और धर्म ही हमे अध्यात्मशास्त्र और साधनाकी पद्धति सिखाता है | वैदिक धर्ममें गृहस्थको पंच महायज्ञ करनेके लिए बताया गया है परंतु आज अधिकांश गृहस्थ यह नहीं करते अतः उनके जीवनमें आध्यात्मिक कष्टकी भरमार रहती है |
४. मृत्यु निश्चित है परन्तु उसके आगमनका समयका हमें ज्ञात नहीं होता
मृत्यु कभी भी आ सकती है अतः मैं बुढ़ापेमें साधना करूंगी/करूंगा इस प्रकारका दृष्टिकोण पूर्णत: त्रुटिपूर्ण है | मनुष्य जीवनके दो उद्देश्य हैं – पहला प्रारब्धको भोगकर समाप्त करना और दूसरा साधना कर आध्यात्मिक प्रगति करना | प्रारब्धका भोग तो स्वतः ही समाप्त हो जाता है; परन्तु साधना करनेके लिए खरे पुरुषार्थकी आवश्यकता होती है अतः मनुष्य जन्म जो बड़े भाग्यसे मिलता है उसका सदुपयोग साधनामें अवश्य ही करना चाहिए | इसे ही मृत्युकी तैयारी करना कहते हैं |
५. छोटी उम्रमें साधना आरंभ करनेपर चित्तमें नए संस्कार निर्माण नहीं होते :
हमारा मन अशांत क्यों रहता है क्योंकि चित्तपर अनेक जन्मोंके असंख्य संस्कार होते हैं | जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है संस्कारोंके केंद्र एवं अन्य संस्कार भी बढ़ते जाते हैं | जैसे एक पाँचवीं कक्षाका विद्यार्थी जब नामजप करने बैठेगा तो उसके मनमें, अपने माता-पिता, भाई-बहन, खेल, मित्र और विद्यालयके विचार आएंगे | परंतु एक ७० वर्षका वृद्ध जिसने कभी साधना नहीं की, यदि वह नामजपके लिए बैठेगा तो उसे पिछले सत्तर वर्षके सभी संस्मरण ध्यानमें विघ्न डालेंगे !
६. छोटी उम्रसे ही साधना करनेसे पूर्व जन्मोंके संस्कारका नष्ट होना :
छोटी उम्रसे साधना शुरू करनेपर इस जन्मके नए संस्कार चित्त में नहीं निर्माण होते हैं और साधनाकी अखंडता रहनेपर चित्तमें जो पूर्व जन्मके संस्कार है वे भी नष्ट हो जाते हैं इस प्रकार वृद्धावस्था आने तक मन आनंदी एवं अनासक्त हो जाता है |
७. वृद्धावस्थामें साधना कर संत पद आसीन हुए संत नाम मात्र हैं !
जो भी व्यक्ति साधना कर संत पद पर आसीन हुए वे अल्प आयुसे ही साधनारत हुए | वृद्धावस्थामें जब मनमें अनेक विचार होते हैं और बुद्धि भी काम करना बंद कर देती है और शरीर रोगोंसे ग्रसित हो जाता है तब साधना कर ईश्वरप्राप्ति करना अत्यधिक कठिन है | वैसे भी ईश्वरको हम ताज़े पुष्प चढाते हैं | वृद्ध शरीर ईश्वरप्राप्तिमें अडचन ही उत्पन्न करता है !

ईश्वर की तरफ से शिकायत:-

ईश्वर की तरफ से शिकायत:-

मेरे प्रिय...!

सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था।

मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात करोगे।
तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे।

लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!!

फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे।
पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!!

फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे...
तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया।

मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो, तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात ही नहीं की...

एक मौका ऐसा भी आया जब तुम बिलकुल खाली थे और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यूं ही बैठे रहे,लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ध्यान नहीं आया।

दोपहर के खाने के वक्त जब तुम इधर- उधर देख रहे थे,तो भी मुझे लगा कि खाना खाने से पहले तुम एक पल के लिये मेरे बारे में सोचोंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

दिन का अब भी काफी समय बचा था।
मुझे लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जायेगी, लेकिन घर पहुँचने के बाद तुम रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गये।

जब वे काम निबट गये तो तुमनें टीवी खोल लिया और घंटो टीवी देखते रहे।

देर रात थककर तुम बिस्तर पर आ लेटे।
तुमनें अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़कर सो गये।

मेरा बड़ा मन था कि मैं भी तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा बनूं...

तुम्हारे साथ कुछ वक्त बिताऊँ...

तुम्हारी कुछ सुनूं...

तुम्हे कुछ सुनाऊँ।

कुछ मार्गदर्शन करूँ तुम्हारा ताकि तुम्हें समझ आए कि तुम किसलिए इस धरती पर आए हो और किन कामों में उलझ गए हो, लेकिन तुम्हें समय ही नहीं मिला और मैं मन मार कर ही रह गया।

मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ।
हर रोज़ मैं इस बात का इंतज़ार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे और अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद करोगे।

पर तुम तब ही आते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए होता है।
तुम जल्दी में आते हो और अपनी माँगें मेरे आगे रख के चले जाते हो।
और मजे की बात तो ये है कि इस प्रक्रिया में तुम मेरी तरफ देखते भी नहीं।

ध्यान तुम्हारा उस समय भी लोगों की तरफ ही लगा रहता है,और मैं इंतज़ार करता ही रह जाता हूँ।

खैर कोई बात नहीं...
हो सकता है कल तुम्हें मेरी याद आ जाये!!!

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

आभार

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।

जीवन अस्थिर अनजाने ही
हो जाता पथ पर मेल कहीं
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल
तय कर लेना कुछ खेल नहीं

दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते
सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।

साँसों पर अवलम्बित काया
जब चलते-चलते चूर हुई
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली
नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई

पथ के पहचाने छूट गए
पर साथ-साथ चल रही याद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।

जो साथ न मेरा दे पाए
उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या
राही मर लेकिन राह अमर

इस पथ पर वे ही चलते हैं
जो चलने का पा गए स्वाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।

कैसे चल पाता यदि न मिला
होता मुझको आकुल-अन्तर
कैसे चल पाता यदि मिलते
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर

आभारी हूँ मैं उन सबका
दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।