गुरुवार, 30 जनवरी 2020

गंगासागर तीर्थ यात्रा

कोलकाता से सुबह लगभग पांच बजे हम सब ३ कारों से गंगासागर जाने के लिए निकले। यह दूरी रेल या बस द्वारा भी तय किया जा सकती  है। गंगासागर या सागरदीप गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी का मिलन स्थल है। यह पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में पड़ता है। गंगासागर वास्तव में एक टापू है। जो गंगा नदी के मुहाने पर है। यह पूरी तरह से ग्रामीण इलाका है। यहाँ की भाषा बंगला है। यहाँ पर रहने के लिए धर्मशाला होटल आदि मिलते है। साथ ही विभिन्न मतों के अनेकों आश्रम भी है। गंगासागर एक पवित्र धार्मिक स्थल है। जहां मकर संक्रांति के दिन 14 व 15 जनवरी को बड़ा मेला लगता है। अभी मेले की तयारी चल रही थी। जिसमें लाखों लोग स्नान और पूजा करने आते हैं। ताकि उनके पाप धुल जाये और आशीर्वाद प्राप्त हो। यह एक पुण्यतीर्थ स्थान है।हम सभी सड़क मार्ग से गंगासागर जाने के लिए कोलकाता से डायमंड हार्बर होते हुए लगभग 98 किलोमीटर दूर सागरद्वीप (काकदीप) पहुँचे। यहाँ से घाट या जेट्टी तक जाने का 10 मिनट का पैदल मार्ग है।  यहाँ गंगा / हुगली नदी को पार करना पड़ता है। काकदीप से पानी के जहाज़ के द्वारा आधे घंटे की यात्रा के बाद हम कचूबेरी घाट पहुँचे। जहाज का टिकिट मात्र दस रुपए हैं। जहाज़ पर 30 मिनट की यह यात्रा बड़ी सुहावनी है। जल पक्षियों के झुंडों को देखने और दाना डालने में यह समय कब निकाल जाता है, पता ही नहीं चलता है। ये पक्षी भी अभ्यस्त है। दाना फेकते झुंड के झुंड पक्षी हवा में ही दाना पकड़ने के लिये झपटते हैं। बड़ा मनमोहक दृश्य होता है।
 इन जहाजों का आवागमन ज्वार-भाटे पर निर्भर करता है। ज्वार-भाटे के कारण जल धारा की दिशा बदलती रहती है। जब जल प्रवाह सही दिशा में होता है तभी ये जहाज़ परिचालित होते है। अन्यथा ये सही समय का इंतज़ार करते हैं। कचूबेरी घाट पहुँच कर बस, कार या जुगाड़ से आगे की यात्रा की जा सकती है। यहाँ से गंगासागर / सागरद्वीप लगभग 30 किलोमीटर दूर है। मार्ग में यहाँ के गाँव नज़र आते हैं। ये मिट्टी की झोपड़ियों और तालाबों वाले ठेठ बंगाली गांव होते है। सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे खेत, नारियल के लंबे पेड़, बांस के झुरमुट और केले के पौधे लगे होते हैं। काफी जगहों पर पान की खेती भी नज़र आती है। गंगासागर पहुँच कर कपिल मुनि का मंदिर नज़र आता है । सामने एक लंबी सड़क जल प्रवाह की ओर जाती है। जिसे पैदल या रिक्शा  पर जाया जा सकता हैं। सड़क के दोनों ओर पूजन सामाग्री की दुकाने है। यहाँ पर भिक्षुक और धरमार्थियों की भीड़ दिखती है।
साथ ही झुंड के झुंड कुत्ते दिखते है। दरअसल गंगासागर में स्नान और पूजन के बाद भिक्षुक को अन्न दान और कुत्तों को भोजन / बिस्कुट देने की प्रथा है। गंगासागर पहुँचने पर दूर-दूर तक शांत जल दिखता है।


यहाँ सागर की बड़ी-बड़ी लहरें नहीं दिखती है। शायद गंगा के जल के मिलन से यहाँ जल शांत और मटमैला दिखता है। पर दूर पानी का रंग हल्का नीला-हरा नीलमणि सा दिखता है। प्रकृतिक का सौंदर्य देख कर यात्रा सार्थक लगती है। लगता है, मानो गंगा के साथ-साथ हमने भी सागर तक की यात्रा कर ली हो। हमलोगों ने जल में खड़े हो कर पूजा किया और प्रथा के अनुसार लौट कर मंदिर गए।

मंदिर में मुख्य प्रतिमा माँ गंगा, कपिल मुनि तथा भागीरथी जी की है। ये प्रतिमाएँ चटकीले नारंगी / गेरुए रंग से रंगे हुए हैं। इस मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। इस मंदिर का निर्माण 1973 में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि पहले के वास्तविक मंदिर समुद्र के जल सतह के बढ्ने से जल में समा गए है। किवदंती-1) ऐसा माना जाता है कि गंगासागर के इस स्थान पर कपिल मुनि का आश्रम था और मकर संक्रांति के दिन गंगा जी ने पृथ्वी पर अवतरित हो 60,000 सगर-पुत्रों कि आत्मा को मुक्ति प्रदान किया था। ऐसी मान्यता है कि ऋषि-मुनियों के लिए गृहस्थ आश्रम या पारिवारिक जीवन वर्जित होता है। पर विष्णु जी के कहने पर कपिलमुनी के पिता कर्दम ऋषि ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। पर उन्होने विष्णु भगवान से शर्त रखी कि ऐसे में भगवान विष्णु को उनके पुत्र रूप में जन्म लेंना होगा। भगवान विष्णु ने शर्त मान लिया और कपिलमुनी का जन्म हुआ। फलतः उन्हें विष्णु का अवतार माना गया। आगे चल कर गंगा और सागर के मिलन स्थल पर कपिल मुनि आश्रम बना कर तप करने लगे। इस दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ आयोजित किया। इस के बाद यज्ञ के अश्वों को स्वतंत्र छोड़ा गया। ऐसी परिपाटी है कि ये जहाँ से गुजरते हैं वे राज्य अधीनता स्वीकार करते है। अश्व को रोकने वाले राजा को युद्ध करना पड़ता है।
राजा सगर ने यज्ञ अश्वों के रक्षा के लिए उनके साथ अपने 60,000 हज़ार पुत्रों को भेजा। अचानक यज्ञ अश्व गायब हो गए। खोजने पर यज्ञ अश्व कपिल मुनि के आश्रम में मिले। फलतः सगर पुत्र साधनरत ऋषि से नाराज़ हो उन्हे अपशब्द कहने लगे। ऋषि ने नाराज़ हो कर उन्हे शापित किया और उन सभी को अपने नेत्रों के तेज़ से भस्म कर दिया। मुनि के श्राप के कारण उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकी। काफी वर्षों के बाद राजा सगर के पौत्र राजा भागिरथ कपिल मुनि से माफी माँगने पहुँचे। कपिल मुनि राजा भागीरथ के व्यवहार से प्रसन्न हुए। उन्होने कहा कि गंगा जल से ही राजा सगर के 60,000 मृत पुत्रों का मोक्ष संभव है। राजा भागीरथ ने अपने अथक प्रयास और तप से गंगा को धरती पर उतारा। अपने पुरखों के भस्म स्थान पर गंगा को मकर संक्रांति के दिन लाकर उनकी आत्मा को मुक्ति और शांति दिलाई। यही स्थान गंगासागर कहलाया। इसलिए इस पर स्नान का इतना महत्व है। कहतें है कि भगवान इंद्रा ने यज्ञ अश्वों को जान-बुझ कर पाताल लोक में छुपा दिया था। बाद में कपिल मुनि के आश्रम के पास छोड़ दिया। ऐसा उन्होने ने गंगा नदी को पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए किया था। पहले गंगा स्वर्ग की नदी थीं। इंद्र जानते थे कि गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने से अनेकों प्राणियों का भला होग।
इसके बाद हम रात ७ बजे तक कोलकाता वापस लौट आए। इस तरह से हमने एक महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा पूरी की। जिससे बड़ी आत्म संतुष्टी मिली। कहा जाता है – 
                               सब तीर्थ बार-बार, गंगासागर एक बार।























मंगलवार, 27 जून 2017

एकांगता

एकांगता



हम अपने आसपास कई व्यक्तियों को देखते हैं। जिनमें में से कुछ हमारे परिचित होते हैं तो बहुत से अज्ञात होते हैं। हम इनसे व्यवहार करें या न करें लेकिन हमारी सोच में ये सब अपनी जगह बनाये रखते हैं। हमारे अधिकांश विचार व्यक्तियों या जीवों से जुड़े रहते हैं। अधिकांश जनों का जीवन बाहरी रूप से अन्य लोगों के बारे में सोचते हुए ही बीत जाता है। अपने जन्म से पहले हम इनसे परिचित नहीं होते और मरने के बाद इन सबसे हमारा कोई संबंध नहीं रह जाता किन्तु फिर भी जीवन का एक बड़ा भाग हम अन्यों को समर्पित करके जी रहे होते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में किसी एक चीज़ पर जो हमारा ध्यान नहीं जाता, वह हम स्वयं हैं| इस संसार में कई जीवात्मा हैं| हम भी उनमें से एक हैं| हम भी सबकी तरह संसार में कर्म करने के लिए आये हुए हैं| हमें भी सबकी तरह अपने प्रारब्ध के फल भोगने हैं| शरीर मिलते ही हम कर्म करने के लिए तैयार हो जाते हैं| अपने ज्ञान के अनुसार हम अच्छे और बुरे कर्म करते जाते हैं| इसी से संस्कार बनते हैं और अगले जन्मों की तैयारी होने लगती है| इन सब बातों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण दो बातें हैं – एक, हमें जाना कहाँ है; दूसरा, हमारा ज्ञान| हमें जाना कहाँ है या अपनी अंत गति हमें कैसी चाहिए, यह बात हमारी दिशा तय करेगी| उसके लिए अंतर्मुख होना पड़ेगा| अभी हम बाहरी संसार के साथ घुले मिले हैं इसीलिए भीतर नहीं देख पाते| जब सब जीवात्माओं की तरह हम स्वयं को भी पृथक रख कर सोचेंगे तो हमें अपनी शक्ति, योग्यता और दिशा का अनुभव होगा| हमें अपनी वास्तविक सम्पदा के दर्शन होंगे और साथ में ईश्वर के साथ हमारे स्थायी सम्बन्ध का भी अनुभव होगा| उसी आनंद रुपी ईश्वर को जानने और पाने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होगी और उसे पाने के लिए हम कर्म करेंगे|
अतः स्वयं को पहचानने के लिए स्वयं को संसार से पृथक रख कर देखना होगा|

कर्म का रहस्य

कर्म का रहस्य

केवल सृष्टिक्रम से होने वाले कार्य ही निर्धारित होते हैं। इसके विपरीत जो भी कार्य हैं, वे सभी जीवात्मा के अधीन हैं और कभी निर्धारित नहीं होते। जैसे दिन के बाद रात आनी ही है। यह सृष्टिक्रम से है और इसका आंकलन किया जा सकता है किंतु कोई व्यक्ति कभी ऐसे यह कार्य करेगा यह कभी नहीं कहा जा सकता। जीव के अधीन कार्य उसकी अपनी इच्छा पर निर्धारित होते हैं। इच्छा जीव के अधीन है और जीव स्वतंत्र है। अर्थात यदि जीव कोई परिणाम लेना चाहता है तो उस परिणाम को प्राप्त करने के लिए उससे संबंधित कर्म उसे करना ही होगा। कार्य नहीं तो परिणाम भी नहीं। प्रतिक्षण वह कार्य को करने के लिए स्वतंत्र है किंतु वह इच्छा करेगा या नहीं, यह कभी भी पूर्वनिर्धारित नहीं होता।
अपने भोगों को जीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के फलों के रूप में है। जब उसने वह कर्म कभी किया था तब वह स्वतंत्र था किंतु उसका फल भोगने में अब वह परतंत्र है। यही न्याय भी है। इसीलिए फलित ज्योतिष एक आधारहीन मत है तथा अविद्या है जिसका सिद्धांत से कोई संबंध नहीं है। जीवात्मा को चाहिए कि वह सिद्धांत को अपने अवचेतन मन में उतारे, अपनी कर्म करने की स्वतंत्रता को पहचाने और इस बात पर दृढ़ विश्वास रखे कि उसके सन्दर्भ में कुछ भी पूर्वनियोजित नहीं है। इच्छित परिणाम के लिए उसे कर्म करना ही होगा। हर क्षण उसे अधिक से अधिक अच्छे कर्म करके अपने लिए पुण्य कर्माशय विकसित करना चाहिए क्योंकि जो क्षण उसके हाथों में है, वैसा क्षण उसे पुनः उपलब्ध नहीं होगा।

शनिवार, 23 जनवरी 2016

ईश्वर की तुलना साकार कुम्भकार से

     कोई जितना अधिक साधन हीन होगा, उसे उतने ही अधिक साधनों की आवश्यकता होगी। हट्टा कट्टा आदमी बैसाखी लेकर नहीं चलता। यदि उसे कोई बैसाखी दे तो वह उसे अपमान समझेगा। इसी के विपरीत एक लंगड़े व्यक्ति के लिए बैसाखी आवश्यकता है। जो उसे बैसाखी देगा, वह उसके प्रति कृतज्ञ होगा। अंतर केवल सामर्थ्य का है।  
       मनुष्य जीव देह धारी है। हाथ पैर उसकी आवश्यकता हैं जिनसे वह अपने कार्य सिद्ध करता है। वह अल्पज्ञ है यानी सीमित ज्ञान वाला। वह एकदेशी है यानी उसका फैलाव केवल उसके अपने शरीर तक ही सीमित है। वहीं ईश्वर सर्वव्यापक है यानी सर्वत्र व्याप्त है। वह सर्वज्ञ है यानी सब जानने वाला। जो सब कुछ जानने वाला हो और कण कण में व्याप्त हो, उसे किस हाथ पैर की जरूरत हो सकती है? वह तो अपना काम एक electron में भी कर रहा है और पृथ्वी के गर्भ से पर्वत निकलते समय भी कर रहा है! जैसे एक computer programmer अपना प्रोग्राम बना कर छोड़ देता है और उसके बाद सॉफ्टवेयर उसके निर्देशानुसार काम करता रहता है, ठीक वैसे ही सृष्टि का programmer वो परमात्मा है। फर्क इतना है बस कि उसके बनाये प्रोग्राम में bugs या त्रुटियाँ नहीं होतीं क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यही है सामर्थ्य का अंतर! निराकार रहना उसकी मजबूरी या दोष नहीं है। यह उसका ऐश्वर्य है, उसका वास्तविक स्वरुप है। हमारा देह धारण करना हमारी लाचारी है। यही सिद्ध करता है कि हम अल्प सामर्थ्यवान और अल्पज्ञ हैं।

जीवन और हमारा उत्तरदायित्व

जीवन और हमारा उत्तरदायित्व

Standard
सृष्टि शुरू होते ही ईश्वर ने सृष्टि रचने के पीछे का प्रयोजन और संसार का भोग कैसे करना है, का पूरा आवश्यक ज्ञान वेदों के माध्यम से मनुष्य मात्र को दिया। कैसे सुखी रहना है, कैसे सफल होना है और कैसे दुखों से दूर रहना है, का पूरा ज्ञान वेद में ईश्वर ने दिया ताकि उसकी संतानों को चुनौतियाँ न देखनी पड़े। सुख बढ़ाने वाले कर्मों को मनुष्य करता है तो सुखी और दुःख बढ़ाने वाले कर्मों को करता है तो दुखी रहता है ईश्वर के system के अनुसार। ईश्वर व्यक्ति को सुखी या दुखी प्रत्यक्ष रूप से कभी भी नहीं करता! उसका काम केवल व्यवस्था करने का था और मनुष्य को कर्म करने के लिए स्वतंत्र रखने का था जो उसने किया। अब मनुष्य को चाहिए कि वह उन नियमों को जाने जो ईश्वर ने बनाये हैं और उन पर चलकर सुखी हो क्योंकि वह कर्मों का फल ही संसार में भोगेगा। वे कर्म कौन से हैं जो कल्याणकारी हैं, उसका ज्ञान वेद में ईश्वर दे चुके हैं। यदि कोई सत्य को जानने के लिए प्रयासरत है और वेद ज्ञान से वंचित है तो वह अधिक दिनों तक वंचित नहीं रह सकेगा लेकिन जो वेद के समीप होकर भी दिग्भ्रमित है या अपने मिथ्याज्ञान पर अभिमान करता है तो समझ लो वह जल से भरा मटका लेकर रेगिस्तान में कुएं की तलाश में है।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

श्री राम और राममन्त्र : तात्पर्य

श्री राम और राममन्त्र : तात्पर्य
-------------------------

वास्तव में राम अनादि ब्रह्म ही हैं। अनेकानेक संतों ने निर्गुण राम को अपने आराध्य रूप में प्रतिष्ठित किया है। राम नाम के इस अत्यंत प्रभावी एवं विलक्षण दिव्य बीज मंत्र को सगुणोपासक मनुष्यों में प्रतिष्ठित करने के लिए दाशरथि राम का पृथ्वी पर अवतरण हुआ है। कबीरदास जी ने कहा है – आत्मा और राम एक है-

' आतम राम अवर नहिं दूजा।'

राम नाम कबीर का बीज मंत्र है। राम नाम को उन्होंने अजपाजप कहा है। यह एक चिकित्सा विज्ञान आधारित सत्य है कि हम २4 घंटों में लगभग २१६०० श्वास भीतर लेते हैं और २१६००  बाहर निकालते हैं। इसका संकेत कबीरदास जी ने इस उक्ति में किया है–

' सहस्र इक्कीस छह सै धागा, निहचल नाकै पोवै।'

मनुष्य २१६०० धागे नाक के सूक्ष्म द्वार में पिरोता रहता है। अर्थात प्रत्येक श्वास - प्रश्वास में वह राम का स्मरण करता रहता है।

राम शब्द का अर्थ है – 'रमंति इति रामः' जो रोम-रोम में रहता है, जो समूचे ब्रह्मांड में रमण करता है वही राम हैं।
इसी तरह कहा गया है –

'रमन्ते योगिनो यस्मिन स रामः'

अर्थात् योगीजन जिसमें रमण करते हैं वही राम हैं।

इसी तरह ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है –

' राम शब्दो विश्ववचनो, मश्वापीश्वर वाचकः'

अर्थात् ‘रा’ शब्द परिपूर्णता का बोधक है और ‘म’ परमेश्वर वाचक है। चाहे निर्गुण ब्रह्म हो या दाशरथि राम हो, विशिष्ट तथ्य यह है कि राम शब्द एक महामंत्र है। वैज्ञानिकों के अनुसार मंत्रों का चयन ध्वनि विज्ञान को आधार मानकर किया गया है।

राम मन्त्र का अर्थ
---------------

' राम ' स्वतः मूलतः अपने आप में पूर्ण मन्त्र है।

'र', 'अ' और 'म', इन तीनों अक्षरों के योग से 'राम' मंत्र बनता है। यही राम रसायन है। 'र' अग्निवाचक है। 'अ' बीज मंत्र है। 'म' का अर्थ है ज्ञान। यह मंत्र पापों को जलाता है, किंतु पुण्य को सुरक्षित रखता है और ज्ञान प्रदान करता है। हम चाहते हैं कि पुण्य सुरक्षित रहें, सिर्फ पापों का नाश हो। 'अ' मंत्र जोड़ देने से अग्नि केवल पाप कर्मो का दहन कर पाती है और हमारे शुभ और सात्विक कर्मो को सुरक्षित करती है। 'म' का उच्चारण करने से ज्ञान की उत्पत्ति होती है। हमें अपने स्वरूप का भान हो जाता है। इसलिए हम र, अ और म को जोड़कर एक मंत्र बना लेते हैं-राम। 'म' अभीष्ट होने पर भी यदि हम 'र' और 'अ' का उच्चारण नहीं करेंगे तो अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होगी।
राम सिर्फ एक नाम नहीं अपितु एक मंत्र है, जिसका नित्य स्मरण करने से सभी दु:खों से मुक्ति मिल जाती है। राम शब्द का अर्थ है- मनोहर, विलक्षण, चमत्कारी, पापियों का नाश करने वाला व भवसागर से मुक्त करने वाला। रामचरित मानस के बालकांड में एक प्रसंग में लिखा है –
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू।
राम नाम अवलंबन एकू।।
अर्थात कलयुग में न तो कर्म का भरोसा है, न भक्ति का और न ज्ञान का। सिर्फ राम नाम ही एकमात्र सहारा हैं।

स्कंदपुराण में भी राम नाम की महिमा का गुणगान किया गया
है –
रामेति द्वयक्षरजप: सर्वपापापनोदक:।
गच्छन्तिष्ठन् शयनो वा मनुजो रामकीर्तनात्।।
इड निर्वर्तितो याति चान्ते हरिगणो भवेत्।
               –स्कंदपुराण/नागरखंड

अर्थात यह दो अक्षरों का मंत्र(राम) जपे जाने पर समस्त पापों का नाश हो जाता है। चलते, बैठते, सोते या किसी भी अवस्था में जो मनुष्य राम नाम का कीर्तन करता है, वह यहां कृतकार्य होकर जाता है और अंत में भगवान विष्णु का पार्षद बनता है।

"राम रामेति रामेति रमे रामे
मनोरमे ।
सहस्र  नाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ।।"

            –जय श्रीमन्नारायण।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

श्री दरियाव दिव्य वाणी

दरिया दीपक राम का गगन मंडल मे जोय ,
तीन लोक चौदह भवन सहज उजाला होय।।

दरिया राजस दूर कर ररंकार लौ लाय ,
राम छांड राजस गहे भौ भौ पर ले जाय।।

शब्द  सूहाया बादशाह साघन सैना जान ,
सैना सहजे आवसी जो चढ आवे सुल्तान।।

रहनी करनी साध की एक राम का ध्यान,
बाहर मिलता सो मिलै भीतर  आतम ज्ञान ।।

तरवर छाना फल नहि पिरथीसे बनराय ,
सतगुरु छाना सिष नहि  दूर देशातंर जाय।।

दरिया संगत साधकी ,सहजै पलटै बंस।
कीट छांड़ मुक्ता चुगै ,होय काग से हंस।।

सांची संगत साध की ,जो कर जानै कोय ।
दरिया  ऐसी सो करे , (जेहिं )  कारज करना होय।।

दरिया  संगत साधकी,  सहजै पलटै अंग ।
जैसे संग मजीठ के  , कपड़ा होय सूरंग।।

दरिया संगत साधकी, कल विष नासे धोय ।
कपटी की संगत किये, आपहू कपटी  होय।।

सतगुरु को परसा नहीं ,सूमिरा नाहीं राम ।
ते नर पसू समान हैं , साँस लेत बेकाम ।।